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अगर सरकार ने संसद में पास करा दिए ये 5 बिल तो पूरे देश में मच सकता है हंगामा

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संसद. और संसद का शीत सत्र. अंग्रेजी में कहें तो विंटर सेशन. आज यानी 18 नवम्बर से शुरू हो गया. और दोनों सदन शुरू हुए हैं तो सरकार बिल पर बिल लेकर आएगी. कई सारे क़ानून, कई सारे संशोधन. और कुल कितने बिल आ रहे हैं?

टोटल 39. पिछले सत्र के बकाया 12 बिल. और 27 नए बिल. यानी हैं तो बहुत सारे. लेकिन हम यहां उन पांच बिलों की बात करने आये हैं, जो सबसे हाई-प्रोफाइल बिल हैं. जिन पर सबसे ज्यादा बहस होगी. खबरें बनेंगी. कीवर्ड्स बुने जाएंगे. गूगल पर सर्चिंग वाला भी हिसाब किताब जमेगा. कौन से पांच? देखिए:

1. Transgender Persons (Protection of Rights) Bill, 2019

पुराने सत्र का बकाया वाला बिल. 5 अगस्त 2019. वो दिन, जब संसद में आर्टिकल 370 को निष्प्रभावी कर देने के आदेश पर बहस हो रही थी, उस समय लोकसभा ने लगभग बिना किसी मतभेद या बहस के एक और बिल पास कर दिया.

ये बिल था भारत के ट्रांसजेंडर समाज को संबोधित. Transgenders की अधिकार सुरक्षा संबंधी बिल. सबसे पहले 19 जुलाई को सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण मंत्री थावरचंद गहलोत ने इसे लोकसभा में पेश किया था. इस सत्र में बिल लोकसभा में पास हो गया था, लेकिन राज्यसभा में पास नहीं हो सका. मौजूदा सत्र में राज्यसभा में इसके पास होने की जुगत शुरू होगी.

ट्रांसजेंडर्स के खिलाफ अपराध करने वाले को 6 महीने से दो साल तक की सजा हो सकती है. (फोटो: रॉयटर्स)
क्या है बिल की ख़ास बातें?

इस बिल का आशय है कि ट्रांसजेंडर लोगों के साथ भेदभाव ख़त्म हो, और समाज में उनके अधिकार सुरक्षित हो सकें. सरकार की मानें तो इस बिल के पास होने के बाद ट्रांसजेंडर को शिक्षा, नौकरी, स्वास्थ्य, सामाजिक सुविधाओं के लाभ, आन्दोलन के अधिकार, संपत्ति कब्ज़ा करने या किराए पर लेने के अधिकार,

सरकारी या प्राइवेट ऑफिस में किसी पोस्ट पर बैठने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है. इस बिल में ये भी प्रावधान है कि ट्रांसजेंडर को उनकी लैंगिक पहचान के आधार पर घर या गांव से निकाला नहीं जा सकता है.

उनका शारीरिक, मानसिक, आर्थिक या भावुकता के आधार पर शोषण नहीं किया जा सकता है. ऐसा करने पर छः से दो साल की सज़ा और फाइन लगाने का प्रावधान है.

इसके साथ ही इस बिल में सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण मंत्रालय के केन्द्रीय मंत्री, राज्यमंत्री और सचिवों के साथ National Council for Transgender persons बनाने का भी प्रावधान है, जिसमें नीति आयोग के सदस्य, राज्य सरकारों के प्रतिनिधि, ट्रांसजेंडर समुदाय के पांच लोग और NGO से जुड़े पांच लोग शामिल किये जायेंगे.

ट्रांसजेंडर व्यक्ति वो है, जिसका जेंडर उसके जन्म के समय निर्धारित हुए जेंडर से मैच नहीं करता. ट्रांसजेंडर और समलैंगिक समुदाय ने सवाल उठाये हैं कि इसकी परिभाषा बिल में बदल दी गयी है.(फोटो: रॉयटर्स)

बिल पर क्यों है बवाल?

जिस दिन ये बिल लोकसभा में पास हुआ, उस दिन को ट्रांसजेंडर समुदाय से जुड़े लोगों ने “जेंडर जस्टिस मर्डर डे” कहा. कहा कि इस दिन लैंगिक न्याय की हत्या हुई. क्यों कहा? क्योंकि इस बिल में इंटरसेक्स लोगों को भी ट्रांसजेंडर की श्रेणी में गिना गया.

इंटरसेक्स मतलब वो शारीरिक स्थिति जो शरीर में जन्म के समय से मौजूद है. जबकि ट्रांसजेंडरशिप और समलैंगिकता जन्म के बाद अपने रहन-सहन और साथी के चुनाव से निर्धारित होती है. समुदाय का कहना था कि सभी इंटरसेक्स को समलैंगिक समुदाय में शामिल नहीं किया जा सकता है.

इस बिल में कहा गया है कि ट्रांसजेंडर समुदाय को सरकारी अधिकारी और डॉक्टर की मौजूदगी में सेक्सुएलिटी का प्रमाणपत्र लेना होगा, जबकि सेक्सुएलिटी स्वतंत्रता का मामला है. अगर किसी महिला का बलात्कार या शारीरिक शोषण होता है तो अभियुक्त को कम से कम सात साल के कारावास की सज़ा होती है,

जबकि इस बिल में बलात्कार या शोषण के लिए छः महीनों से दो सालों तक की न्यूनतम सजा का प्रावधान ही है, इस पर भी आपत्ति हुई. वहीं अगर कोई समलैंगिक या ट्रांसजेंडर किसी दबाव की वजह से अपना घर छोड़ना चाहता है,

वो घर छोड़कर अपने समुदाय के पास नहीं जा सकता है. उसे पहले अदालत में जाना होगा, जहां से अदालत उन्हें पुनर्वास केंद्र भेज सकती है. इस तथ्य को भी समलैंगिक समुदाय ने मानवाधिकार के उल्लंघन के तौर पर देखा.

2. Surrogacy (Regulation) Bill, 2019

ये भी बकाया वाला बिल. दिन वही. 5 अगस्त 2019. जम्मू-कश्मीर और लद्दाख पर सदन में बहसबाजी हो रही थी, और लोकसभा में एक और बिल पास हो गया. सरोगेसी रेगुलेशन बिल. 15 जुलाई 2019 को लोकसभा में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ. हर्ष वर्धन ने पेश किया था.

आप पूछेंगे कि सरोगेसी का मतलब क्या? चलताऊ भाषा में कहें तो किराए की कोख. बिल में कहा गया है कि अगर कोई महिला किसी दूसरे कपल के बच्चे को अपनी कोख से जन्म देती है, और बच्चे को उस कपल को सौंप देती है तो इस प्रैक्टिस को सरोगेसी कहते हैं.

नए सरोगेसी बिल से सरकार का आशय है कि सरोगेसी के व्यावसायिक इस्तेमाल को रोका जा सके.

क्या है बिल की ख़ास बातें?

बिल में प्रावधान है कि सरोगेसी की प्रैक्टिस का व्यावसायिक उपयोग बंद किया जाए. कहा गया है कि सरोगेसी का उपयोग परोपकार के लिए किया जाना चाहिए.

बिल में इस परोपकार के लिए शब्द है Altruistic. कहा गया है कि जो महिला इस “परोपकार” के तहत बच्चा पैदा कर रही है, उसे मेडिकल खर्च और जीवन बीमा छोड़कर और पैसे नहीं दिए जा सकते हैं.

बिल के आधार पर कहें तो सरोगेसी का उपयोग तभी किया जा सकता है जब कपल का “बांझपन” सिद्ध हो चुका हो, परोपकारी हो, व्यावसायिक उपयोग के लिए न हो, बच्चों को बेचने, सेक्स व्यापार या शोषण के दूसरे अर्थों के लिए इसका उपयोग न हो. ये भी कहा गया है कि सरोगेसी की सुविधा देख रहे कपल को “ज़रूरत” और “अर्हता” का सर्टिफिकेट भी लेना होगा.

सरोगेसी के लिए जिस महिला का चुनाव किया जाना है, उसके लिए प्रावधान हैं कि उस महिला को कपल का करीबी रिश्तेदार होना चाहिए, उसे शादीशुदा होना चाहिए और उसका खुद का बच्चा होना चाहिए,

उसकी उम्र 25-35 साल के बीच होनी चाहिए, जीवन में बस एक बार सरोगेट हुआ होना चाहिए और सरोगेसी के लिए शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का सर्टिफिकेट होना चाहिए.

नए बिल में कहा गया है कि सरोगेसी की इच्छा रखने वाले कपल को ज़रुरत और अर्हता का सर्टिफिकेट लेना होगा.

बिल पर बवाल क्यों?

इस बिल के बारे में कहा गया कि ये बिल महिलाओं से उनके शरीर पर अधिकार को छीन लेता है. चूंकि इस बिल का मकसद परोपकार के लिए सरोगेसी का उपयोग करना है, और परोपकार में इंश्योरेंस और मेडिकल खर्च से अलग पैसे नहीं देने हैं.

तो आलोचना ये कि महिलाओं से कहा जा रहा है कि वे बिना पैसे के अपने शरीर का उपयोग बड़े हित या परोपकार के लिए करें. अशोका यूनिवर्सिटी में सेंटर फॉर स्टडीज़ इन जेंडर एंड सेक्सुएलिटी की डायरेक्टर माधवी मेनन अपने में लिखती हैं,

“स्पर्म डोनर पैसा कमाते रहेंगे. मतलब पुरुषों का अपना शरीर पर अधिकार बना रहेगा, लेकिन सरोगेसी के लिए अपना शरीर देने वाली महिला पुलिसिंग और नियमों के दायरे में रहेगी.

ऐसा देखने को मिलता है कि देश में सरोगेसी का व्यावसायिक उपयोग हो रहा है, कई महिलाओं को इस पेशे में उनके लालची परिवार के दबाव में आना पड़ता है. इस बिल से गरीब महिलाओं को और भी गरीबी के हाशिये पर धकेला जा रहा है.”

3. Medical Termination of Pregnancy (Amendment) Bill, 2019

नया वाला बिल. स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से सदन में पेश किया जाएगा. 2 अगस्त 2019 को दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल किये affidavit में सरकार ने कहा कि वह 1971 के मेडिकल गर्भपात के बिल में संशोधन कर रही है.

क्या है बिल की ख़ास बातें?

गर्भपात को लेकर लम्बे समय से कानून में संशोधन की बात हो रही थी. गर्भपात की अवधि बढाने की बात हो रही थी. 1971 के गर्भपात बिल में ये अवधि थी 12 हफ़्तों की, ख़ास केसों में बढ़कर इसे 20 हफ्ते तक किया जा सकता था.

नए प्रस्तावित संशोधन में, जिसकी कॉपी अभी सामने नहीं आई है, मेडिकल गर्भपात की अवधि बढ़कर 26 हफ्ते की जा सकती है. ट्रिब्यून को दिए अपने में डॉ. हर्षवर्धन ने कहा,

“नए MTP Act से गर्भपात की सेवाओं में ज्यादा सुरक्षा, किफायत और ज्यादा कानूनी सुधार होंगे. क़ानून मंत्रालय के सुझाव के बाद हमने इसमें फिर से कुछ परिवर्तन किये हैं.”

नए बिल के बारे में ये भी कहा जा रहा है कि बलात्कार और घर के सम्बन्धियों के बीच अनैतिक शारीरिक संबंधों से हुए गर्भधारण के बारे में भी कुछ ज़रूरी प्रावधान शामिल किये जाने हैं. इसके साथ ही उन गर्भस्थ शिशुओं के एबॉर्शन के बारे में भी प्रावधान शामिल करने की चर्चा है, जिनके बचने की आशंका बहुत कम होती है.

नये बिल से ऐसी आशा की जा रही है कि गर्भपात के लिए अधिकतम समय 26 हफ़्तों तक बढाया जा सकता है. (तस्वीर साभार : एशिया न्यूज़)

बिल पर क्या बहस हुई है?

अभी तक तो कुछ ख़ास नहीं, क्योंकि बिल का मूल स्वरुप सामने नहीं आ सका है. इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर करने वाले एक्टिविस्ट है,

“अगर महिलाओं को 20 हफ़्तों से बढ़ाकर 26 हफ़्तों तक की प्रेगनेंसी ख़त्म करने की इजाज़त नहीं दी जाती है, तो महिलाएं या तो विदेश जाकर एबॉर्शन कराएंगी या तो देश में ही गैरकानूनी तरीकों का इस्तेमाल करेंगी.”

4. Inter-State River Water Disputes (Amendment), Bill, 2019

पिछले सत्र का बकाया वाला बिल. राज्यों के बीच नदियों के पानी को लेकर बवाल चलता रहता है. इसको लेकर जलशक्ति मंत्रालय एक बिल लेकर आया. कोशिश 1956 के एक्ट में संशोधन करने की.

एजेंडा कि राज्यों के बीच अगर नदियों के पानी को लेकर कोई रार होती है, तो उसमें तुरंत केंद्र सरकार द्वारा बनायी गयी कमिटी हस्तक्षेप करे. जलशक्ति मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने 25 जुलाई को लोकसभा में पेश किया, 31 जुलाई को लोकसभा से पास हो गया.

कावेरी दक्षिण भारत की एक नदी है. करीब 750 किलोमीटर लंबी. कर्नाटक के कोडागू जिले से निकलती है और तमिलनाडु से होती हुई बंगाल की खाड़ी में गिरती है.

केरल और पुदुच्चेरी से भी इसका कुछ हिस्सा गुजरता है. इसीलिए इन चारों राज्यों का नदी के पानी पर हक बनता है. सबसे बड़ा दावा है कर्नाटक और तमिलनाडु का.

बिल की ख़ास बात क्या है?

अगर दो राज्यों के बीच किसी नदी के पानी को लेकर विवाद होता है – जैसे कावेरी के पानी को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच हुआ करता है – तो राज्य केंद्र सरकार से हस्तक्षेप करने का आग्रह कर सकता है. केंद्र सरकार इस मसले को एक ट्रिब्यूनल के पास भेज सकता है.

अगर बातचीत से मसला हल नहीं हो सकता है, तो केंद्र सरकार Dispute Resolution Committee (DRC) का गठन करेगी. DRC मसले का एक साल के भीतर मामले का हल निकालेगी और अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंप देगी.

इस मसले के लिए गठित ट्रिब्यूनल के पास भी मामले में निर्णय देने के लिए 3 साल का समय होगा. सभी नदियों के बेसिन से जुड़े आंकड़े भी कलेक्ट करने की योजना इस बिल के अन्दर शामिल की गयी है.

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बिल पर बवाल क्यों है?

ख़ासा बवाल तो नहीं, लेकिन पूरे मसले के केन्द्रीकरण पर सवाल उठाये गए हैं. जब बिल लोकसभा में पेश किया गया तो विपक्ष ने कहा कि राज्यों के मसलों को केवल केंद्र सरकार पर केन्द्रित नहीं कर देना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि DRC से लेकर ट्रिब्यूनल तक सभी केंद्र सरकार द्वारा गठित किये जाने हैं.

वहीं नदियों के बेसिन डाटा कलेक्शन को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं. कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने कहा सरकार चाहती है कि डाटा जुटाने का काम किसी बाहरी एजेंसी को सौंप दिया जाए, जिससे आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं.

कांग्रेस ही नहीं, भाजपा की सहयोगी शिरोमणि अकाली दल ने भी इस बिल का विरोध किया था. चूंकि पंजाब और हरियाणा में भी सतलुज के पानी को लेकर विवाद होता रहा है, तो अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने था,

“हम इस बिल का विरोध करते हैं. इस बिल को इसके मौजूदा स्वरुप में राज्यसभा में पेश नहीं किया जा सकता है. अकाली दल पंजाब के पानी की एक बूंद भी किसी और राज्य को देने को तैयार नहीं है. “

5. Personal Data Protection Bill, 2019

डाटा. प्राइवेसी. सुरक्षा. ये डिजिटल इण्डिया के बड़े कीवर्ड्स हैं. सब पर बहुत बहस होती रही है. सरकार का कहना है कि वो नागरिकों के आंकड़ों की सुरक्षा को लेकर तत्पर है.

तो निजी डाटा की सुरक्षा को लेकर ये नया बिल है. लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में पेश किया जाएगा. 2018 में बिल का ड्राफ्ट सामने आ गया था. लेकिन लोकसभा का कार्यकाल ख़त्म हो गया तो पेश नहीं हो सका था.

क्या है बिल की ख़ास बातें?

बिल के ड्राफ्ट में कहा गया कि तमाम बिजनेस उपक्रमों को इस बात के लिए विशेष रूप से अनुमति लेनी होगी कि वे अपने उपभोक्ता का डाटा कलेक्ट कर रही हैं. यूज़र को इस बात की भी जानकारी देनी होगी कि कंपनियां यूज़र के डाटा का किस रूप में इस्तेमाल करने वाली हैं.

और यूज़र का “संवेदनशील” डाटा भारतीय सीमा के भीतर की स्टोर किया जाएगा. अगर कम्पनियां किसी रूप में नियमों का उल्लंघन करती हैं तो उन्हें 15 करोड़ या अपने सालाना टर्नओवर का 4 परसेंट जुर्माने के रूप में भरना होगा.

क़ानून और टेलिकॉम मिनिस्टर रविशंकर प्रसाद. सरकार का कहना है कि वो नागरिकों के डाटा को लेकर बेहद जागरूक है, लेकिन जानकारों का मानना है कि सरकार डाटा पर नियंत्रण बनाएगी तो सरकार पर कौन बनाएगा?

बिल पर क्या बवाल?

जब बिल का ड्राफ्ट सामने आया तो बवाल हुआ था. में छपी खबर की मानें तो कई कंपनियों ने बिल के ड्राफ्ट पर अपनी आपत्ति दर्ज की थी. कहा था कि इस बिल के आने के बाद देश में उनका व्यापार कमज़ोर हो जाएगा.

कहा गया कि गूगल और फेसबुक जैसी बड़ी कंपनियों को फिर से अपना काम करने का तरीका बदलना होगा. क्योंकि सरकार की मांग है कि संवेदनशील डाटा देश के भीतर स्टोर किया जाएगा. साइबर और टेक मामलों के वकील सलमान वारिस का कहना है,

“डाटा कलेक्शन के लिए नए नियम आ रहे हैं. डाटा को लोकलाइज़ करने की कोशिश हो रही है. ऐसे में कंपनियों को तो अपना काम करने का तरीका बदलना पड़ेगा, ऐसे में सीधा असर कंपनियों पर पड़ेगा.

हो सकता है कि यूज़र को भी असुविधा हो. और चूंकि सरकार डाटा को पूरी तरह से नियंत्रित करने की जुगत में है, तो ऐसे में ये सवाल उठता है कि सरकारी अमला डाटा को नियंत्रित कर रहा है तो सरकार को कौन नियंत्रित करेगा?”

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