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आज दर दर की ठोंकरे खा रही हैं शहीद हनुमंथप्पा की पत्नी…इनकी मदद कर दो मोदी सरकार

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तीन साल पहले जम्‍मू-कश्‍मीर के सियाचिन में शहीद होने वाले कर्नाटक के लांसनायक हनुमंथप्पा की बहादुरी को पूरे देश ने सल्‍यूट किया था। उस समय केंद्र और राज्‍य सरकारों ने जवान के घरवालों को नौकरी, घर और जमीन देने का वादा किया था। साथ ही उनकी 5 साल की बेटी का भविष्‍य सुरक्षित करने की दिशा में भी कदम उठाने की बातें की गई थीं पर जवान की पत्‍नी महादेवी को अब तक कोई नौकरी नहीं मिल सकी है। उनके पास ऐसा कोई आर्थिक स्‍त्रोत भी नहीं है जिसके जरिये वह अपनी बेटी को बेहतर शिक्षा दिला सकें।

‘मिली तो सिर्फ अस्‍थाई नौकरी’ : महादेवी बताती हैं, ‘दो साल पहले मुझे केंद्र सरकार की तरफ से एक पत्र मिला था। इसमें मुझसे धारवाड़ जिले में रेशम उत्‍पादन विभाग में नौकरी करने के संबंध में पूछा गया था। मैंने वहां छह से आठ महीने तक अस्‍थायी कर्मचारी के रूप में काम किया। इस दौरान मुझे छह हजार रुपये वेतन दिया गया। जब मैंने अधिकारियों से अपनी नौकरी पक्‍की करने की बात की तो उन्‍होंने कोई जवाब नहीं दिया।

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‘छोड़ दिया नौकरी का प्रयास’ : शहीद जवान की पत्‍नी के मुताबिक, ‘उन्‍होंने नौकरी पाने के लिए काफी मशक्‍कत की। उन्‍होंने मुख्‍यमंत्री, कलेक्‍टर से लेकर कई विभागों को इस संबंध में पत्र भेजा लेकिन कोई जवाब नहीं आया। इसके बाद स्‍थायी नौकरी पाने की मेरी सारी आशाएं खत्‍म हो गईं।’

‘वादे से मुकर गईं स्‍मृति ईरानी’ : महादेवी ने बताया, ‘केंद्रीय मंत्री स्‍मृति ईरानी ने मुझे सरकारी नौकरी दिलाए जाने को लेकर एक ट्वीट किया था। उनके हुबली आने पर मैंने उनसे मुलाकात की तो उन्‍होंने ऐसा कोई ट्वीट किए जाने से इनकार कर दिया। सरकारों की असंवेदनशीलता को देखते हुए अब मैंने नौकरी के लिए कहना छोड़ दिया है।’

कृषि भूमि तो मिली पर बंजर’ : कर्नाटक सरकार ने महादेवी को बेगदूर के पास चार एकड़ कृषि भूमि दी है पर बंजर होने की वजह से यह किसी काम की नहीं है। इसके अलावा बारीदेवरकोप्‍पा में एक एकड़ का प्‍लॉट भी महादेवी को मिला है पर अभी तक उनका घर नहीं बनवाया गया है। महादेवी को अपनी बेटी की भविष्‍य की चिंता खाए जा रही है। उन्‍होंने बिटिया को निशुल्‍क शिक्षा दिलाए जाने की मांग की है।

6 दिन तक बर्फ में दबे रहे थे हनुमंथप्‍पा : बता दें कि लांसनायक हनुमंथप्‍पा सियाचिन में छह दिन तक बर्फ के नीचे दबे रहे। उनको चमत्‍कारिक रूप से जीवित अवस्‍था में सेना ने बाहर निकाल लिया था लेकिन उनकी तबीयत इतनी ज्‍यादा खराब हो गई थी कि उन्‍हें बचाया नहीं जा सका। 25 फीट नीचे बर्फ में दबे रहे जवान को दिल्‍ली के सैन्‍य अस्‍पताल में भर्ती कराया गया था। जवान की मौ’त के बाद धारवाड़ जिले में स्थित उनके पैतृक गांव बेटादुर में कई मंत्रियों और अधिकारियों का काफिला आया था और ढेर सारे वादे किए गए थे।

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