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कभी तांगे से चलते थे MDH वाले ताऊ…सड़क पर रेहड़ी भी लगाई और आज मसालों की दुनिया के बादशाह है

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देश की प्रसिद्ध मसाला कंपनी एमडीएच के मालिक महाशय धर्मपाल गुलाटी एक बार फिर चर्चे में हैं। कुछ दिनों पहले उनके मौत की अफवाह उड़ी थी, तब वह चर्चा में थे। उन्हें मोदी सरकार ने पद्म भूषण पुरस्कार दिया है। अभी वह 95 साल के हैं। आइये उनसे जुड़ीं कुछ खास बातों को जानते हैं जो उन्होंने खुद एक इंटरव्यू के दौरान बताई थी।

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पाकिस्तान के सियालकोट स्थित एक मुहल्ले में पिता चुन्नीलाल व माता चन्नन देवी के घर में 27 मार्च, 1923 को उनका जन्म हुआ। पांच साल की उम्र में उनका स्कूल में दाखिला करवा दिया गया, लेकिन स्कूल में मन नहीं लगता था। पढ़ाई की बात आते ही कोई न कोई बहाने तलाशने लग जाते थे। जैसे-तैसे पांचवीं तक पढ़ा। फिर उनके पिताजी ने अपनी मसाले की दुकान में काम के लिए लगा दिया। इस दौरान तजुर्बे के लिए कई और काम सीखे। उनकी दुकान खूब चलती थी। कुछ दिन रेहड़ी पर मेहंदी की पुड़िया बेची। उनके परिवार में दस लोग थे माता-पिता के अलावा भाई धर्मवीर, वह, सतपाल और पांच बहनें दुर्गादेवी, शांतिदेवी, लीलावती, सत्यवंती और संतोष। घर में दो भैंसें थीं। पौष्टिक खुराक के अलावा कुश्ती, खेल-कूद आदि खूब चल रहा था जिंदगी में।

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कारोबार ठीक चल रहा था। 18 साल का होने पर उन पर शादी के लिए दबाव बढ़ा। न-नुकुर के बावजूद 1942 में लीलावंती के साथ शादी हो गई। देश विभाजन के दौरान सियालकोट छोड़ना पड़ा, क्योंकि पूरा इलाका दंगे-फसाद की आग में बुरी तरह जलने लगा था। उन्होंने देखा कि इस दौरान आरएसएस के लोगों ने पीड़ितों की खूब मदद की। मार-काट के बीच जैसे तैसे अमृतसर पहुंचे और वहां अपने एक आढ़ती के यहां शरण ली। उनका वहां मन नहीं लगा। बड़े भाई धर्मवीर और एकाध रिश्तेदार के साथ दिल्ली चला आए। कुछ काम-धंधा न मिला तो तांगा चलाने लगे। इस दौरान पिता समेत पूरा परिवार दिल्ली आ गया। तांगे का काम छोड़कर तब उन्होंने अजमल खां रोड पर गुड़-शक्कर का छाबा लगाया। उससे भी मन ऊब गया। मन मसालों के पुराने कारोबार के लिए प्रेरित करता था। फिर अजमल खां रोड पर खोखा बनाकर दाल, तेल, मसालों की दुकान शुरू कर दी। तजुर्बा था, इसलिए काम चल निकला। खारी बावली से मसाले खरीदता था।

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परिवार बढ़ा तो उन्होंने किराए का मकान छोड़कर अपना मकान खरीदने का मन बनाया। 1954 में उन्होंने अजमल खां रोड पर 45 हजार की कीमत का आशियाना खरीदा। भाइयों समेत पूरा परिवार वहां आ गया। ऊपर मकान, नीचे दुकान से काम चलने लगा। काम बढ़ने लगा तो बड़ी फैक्ट्री लगाने की जद्दोजहद चली। 1960 में कीर्ति नगर में फैक्ट्री लगाई और इस तरह लंबे संघर्ष के बाद दिल्ली में एक मुकाम पा लिया। पूरे देश में एमडीएच मसालों की धूम मचने लगी और घर-घर में उनके मसालों का इस्तेमाल होने लगा। जो मकान रहने के लिए खोला था, वह रूपक के नाम से था। उसी नाम से कपड़ों का ‘रूपक स्टोर्स’ खोला। उसका विस्तार किया और उसे एक तरह से सुपर स्टोर में बदल दिया। होम डिलीवरी भी शुरू की। रेडियो पर इसका खूब प्रचार हुआ। बाद में कपड़ों की दुकान बंद कर ‘चाट बार’ नाम से दुकान शुरू की। वह एक फेमस रोस्ट्रॉन्ट बन गया। बाद में उन्होंने बढ़ती व्यस्तता के चलते ‘चाट बार’ बंद कर दिया लेकिन रूपक स्टोर चलता रहा।

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उनके घर में छह बेटियां और दो बेटे पैदा हुए। कारोबार स्थापित हुआ तो समाज उत्थान के लिए प्रयास शुरू हुए। सत्संग होने लगे। हर शनिवार को परिवार समेत ऋषिकेश जाने लगे। वहां भजन कीर्तन करते। इच्छा और बढ़ी तो जनकपुरी में माताजी के नाम पर चन्नन देवी अस्पताल बनाया। अस्पताल के साथ-साथ दिल्ली और देश में अनेक स्कूलों, आश्रमों, गुरुकुलों का निर्माण करवाया। कई गौशालाओं का संचालन किया। अभी एमडीएच के 50 से अधिक प्रॉडक्ट बाजार में हैं। दिल्ली के अलावा गुरुग्राम व नागौर में तीन-तीन फैक्ट्रियां हैं। पूरे देश में एमडीएच की एजेंसियां हैं। यूएस, कनाडा, पूरे यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, स्विटजरलैंड, आदि में एमडीएच का माल सप्लाई होता है। छोटे बेटे संजीव के असामयिक निधन ने गहरी पीड़ा पहुंचाई लेकिन इसे इस नश्वार दुनिया का दस्तूर समझकर खुद को संभाला। खास रणनीति के तहत बढ़ी उम्र के बावजूद कंपनी का खुद ब्रैंड ऐंबैसडर बने। टीवी पर खुद विज्ञापनों का प्रचार किया। ‘असली मसाले सच-सच’ और ‘यही है असली इंडिया’ डायलॉग से उन्होंने मसालों के प्रचार को अलग अंदाज में पेश किया।

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