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विशेष

गोरखा जवान ने ट्रेन में मासूम लड़की को गैंगरे’प से बचाया-हर लड़के को जरूर पढ़नी चाहिए ये कहानी

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एक 35 साल के एक सैनिक ने अपनी बहादुरी से हथियारबंद 40 लोगों का सामना किया। इस वीर सैनिक ने लोगों को इन लुटेरों से बचाया बल्कि एक 18 साल की लड़की इन हैवानों से रक्षा भी की। गोरखा रेजीमेंट के इस एक्स सैनिक ने अपने साहस से एक बार फिर साबित किया कि सेना देश की गौरव है और सेना का जवान हमेशा हमेशा अपनी जान की बाजी लगाने के लिए तैयार रहता है, चाहे वह जंग का मैदान और या फिर आम जीवन।

घ’टना सितंबर महीने की है, जब विष्णु श्रेष्ठ नाम का गोरखा रेजीमेंट का यह जवान मौर्य एक्सप्रेस में सफर कर रहा था। पिता की तरह विष्णु भी देश की सेवा करना चाहता था। 35 साल के एक्स गोरखा सैनिक विष्णु अंधियारी रात में ट्रेन की खिड़की से ट्रेन से गुजरते जंगलों की ओर देख रहे थे। ट्रेन में खामोशी थी, लेकिन ये खामोशी किसी बड़े तूफान का संकेत दे रही थी।

तभी आधी रात के मध्य अचानक से किसी यात्री ने ट्रेन की चैन को खींचा और 40 लोगों का एक हथियार बंद झुंड धड़ाधड़ ट्रेन में चलने लगा। इनके कुछ साथी तो ट्रेन में ही सफर कर रहे थे, तब किसी को यकीन नहीं था कि ये लुटेरे हैं। इन हथियार बंद लुटेरो ने चाकू, तलवार और अन्य हथियारों से लोगों को डराकर लूटना शुरू कर दिया। लुटेरों ने लोगों की घड़ी और लैपटॉप लूट लिए और उन्हें बंधक बना लिया। थोड़ी ही देर में ट्रेन में नजारा ही बदल गया। ट्रेन की बोगी में अफरा-तफरी मच गई है। लोग डर के मारे चिल्लाने लगे। लुटेरे विष्णु के पास आए और उनसे सारा माल सौंपने को कहा। लुटेरों का ध्यान हटाने के लिए उन्होंने भी चिल्लाना शुरू कर दिया। तभी लुटेरों ने 18 साल एक लड़की को उसके माता-पिता के सामने अपनी हव’स का शिकार बनाना चाहा।

अब विष्णु का खून खौलने लगा। उन्होंने हथियार बंद लुटेरे से लौहा लिया। उन्होंने खुखरी से लुटेरों का सामना किया और विष्णु गोरखा सैनिक लुटेरों पर टूट पड़े। उन्होंने उस लड़की की अस्मिता की रक्षा की। जब लुटेरे विष्णु पर एक साथ टूट पड़े तो वे महिला के आगे किसी ढाल की तरह खड़े हो गए। विष्णु ने अपनी बहादुरी से तीन लुटेरों को वहीं मौ’त की नींद सुला दिया और आठ लुटेरे गंभीर रूप से घायल हो गए। विष्णु की बहादुरी देखकर दूसरे लुटेरे भाग गए। लुटेरों के साथ इस हाथापाई में विष्णु के बाएं हाथ में ब्लैड से चोट आई। 20 मिनट का यह पूरा घ’टनाक्रम किसी फिल्म की क्लइमैक्स की तरह चला और विष्णु एक रियल की हीरो की तरह यात्रियों की जान के साथ उनके सामान की रक्षा की।

स्टेशन से कुछ पुलिस और आपातकालीन कर्मी तैयार थे और उन्होंने फटाफट ट्रेन में सहायता पहुंचाई और घायलों को अस्पताल पहुंचाया। घायलावस्था में विष्णु को अस्पताल पहुंचाया गया, जहां उन्हें ठीक होने में करीब एक महीने का समय लगा। पुलिस घायल आठ लुटेरों को गिरफ्तार किया और उनके पास से चार लाख नकदी, सोने के नैकलेस, सेल फोन, लैपटॉप भी बरामद किया गया।

विष्णु की इस बहादुरी के लिए दो पदकों से सम्मानित किया गया साथ ही उन्हें चांदी से जड़ित खुखरी और 50 हजार का नकद पुरस्कार भी दिया गया। यह इनाम गैंग के सदस्य को पकड़वाने पर घोषित था। जिस लड़की के सम्मान की रक्षा विष्णु ने की, उन्होंने भी एक बड़ी राशि विष्णु को देने की घोषणा की, लेकिन विष्णु ने यह कहकर इसे लेने से इंकार कर दिया कि एक सैनिक का कर्तव्य दुश्मनों से मुकाबला करना होता है और एक सैनिक के रूप में मैंने अपने कर्तव्य को निभाया है।

एक इंसान होने के नाते भी मैंने कर्तव्य को निभाया है। विष्णु ने अपनी बहादुरी और कर्तव्य से यह साबित किया कि देश के जाबांज वीर अभी भी मां भारती और यहां की महिलाओं की रक्षा के लिए तत्पर हैं।

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