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धार्मिक

तुम संकट में पड़े इंसान की मदद करो..मैं कभी तुम पर संकट नहीं आने दूंगा…..

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कभी कभी जिंदगी में ऐसे मोड आ जाते हैं जब हमें लगता है कि हम फंस चुके हैं। कोई राह नहीं दिखती। ऐसे में हमें कुछ सही लगता। उस समय हमें जरूरत होती है एक मार्गदर्शन की। वो मार्गदर्शन जो हमें जिंदगी और जीवन की सच्चाई बताए। आज हम महादेव की उन बातों को बताने जा रहे हैं जो जीवन का महत्व समझाती हैं।

अपने दुख का कारण व्यक्ति किसी और को समझेगा तो हमेशा दुखी रहेगा। व्यक्ति की पीड़ा का जिम्मेदार वो स्वयं होता है। उसके कर्म होते हैं। अपने दोष किसी और पर आरोपित करके आप सुखी नहीं रह सकते। अपने आप को बदलिए दुनिया बदल जाएगी। तुम संकट में पड़े इंसान की मदद करो..मैं कभी तुम पर संकट नहीं आने दूंगा।

प्रत्येक आत्मा का लक्ष्य केवल सुख की प्राप्ति ही तो है। परंतु वो सुख है परमानंद की प्राप्ति लेकिन इंसान सुख नहीं, सुख को प्रदान करनेवाली वस्तुओको एकत्रित करना ही जीवन का उद्देश्य मान लेते हैं। समस्त संसार माया है, सब कुछ नश्वर है जिन वस्तुओं को हम सुख का स्त्रोत समझ कर एकत्रित करते रेहते है वो सदैव नही रहेंगी। जो व्यक्ति इस सत्य को जानते हुए भी लोभ का परित्याग नहीं करते वो सदैव इन्हे खोने के भय मे जीते हैं। और जो व्यक्ति इस सत्य को जानते ही नहीं वो अहंकार मे जीते हैं और जहा अहंकार और भय उपस्थित हो वह सुख कैसे रहसकता है ।

किसी को दुख है कि उसके पास कुछ भी नही और जिसके पास सब कुछ है उसे ये दुख है कि पाने को कुछ शेष नहीं। सुख को हम स्वयं अपने दृष्टीकोन से परिभाषित कर देते हैं। अकेले केवल पराजय मिलती है। विजय तो आपसी सहयोग और तालेल से मिलती है। विजय के बाद स्वयं पर विजय पाना भी आवश्यक है। जो आशक्त हैं निर्बल हैं, जिस में युद्ध करने का समर्थाये नहीं उस पर आक्रमण करना युद्ध नहीं आत्याचार हैं, वीरता नहीं कायरता हैं। लोभ और महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए तो तीनों लोक का धन भी कम हैं। लोभ छोड़कर आप जितना अर्जित (जमा) करते हैं उतना ही पूरक होता है।

संतोष को जितना बाहर ढूंढोगे, उतना ही असंतोष बढ़ेगा, असुरक्षा बढ़ेगी! क्योंकि तुम्हारे बाहर जो कुछ भी है, सब नश्वर है! संतोष के लिये अनिवार्य तत्त्व केवल अपने भीतर ही प्राप्त होते हैं! और अपने अंतर्मन तक पहुँचने का मार्ग केवल योग से ही प्रशस्त हो सकता है।

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