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दिल्ली क्रिकेट संघ ने 2 साल में मुकदमेबाजी पर खर्च किए 9 करोड़, दो वकीलों की सेवा समाप्त

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दिल्ली एवं जिला क्रिकेट संघ (डीडीसीए) ने पिछले दो वर्षों में मुकदमेबाजी पर लगभग नौ करोड़ रुपये खर्च किए हैं। रविवार रात एक शीर्ष परिषद की बैठक में इस पर चर्चा की गई, जिसमें अधिवक्ता अंकुर चावला और गौतम दत्ता को तत्काल प्रभाव से हटाने का निर्णय लिया गया है। साथ ही परिषद ने स्टैंडिंग काउंसिल दत्ता द्वारा हस्ताक्षरित और जारी किए गए सभी वकालतनामों को वापस लेने का फैसला किया है। जाहिर तौर पर खर्च की जांच करने के उद्देश्य से यह कदम उठाया गया है।

परिषद ने हालांकि मुकदमेबाजी पर खर्च को नियंत्रित करने के लिए कदम उठाए, मगर डीडीसीए के आंतरिक लेखा परीक्षकों की ओर से चल रहे फॉरेंसिक ऑडिट को प्रभावी ढंग से रोक दिया। यह एक ऐसा कदम रहा, जिसे लेकर परिषद के कुछ सदस्यों की ओर से सवाल उठाए गए हैं और ‘पारदर्शी तरीके’ से एक नए फोरेंसिक ऑडिटर को नियुक्त करने की मांग की गई है। इसके लिए ‘खुली बोलियों’ की मांग की गई है। फोरेंसिक ऑडिट लगभग एक सप्ताह से चल रहा है, जिसे एएसए एंड एसोसिएट्स द्वारा अंजाम दिया जा रहा है।

केंद्र सरकार के नुमाइंदों (नॉमिनी) सहित 18 परिषद सदस्यों में से 11 सदस्य रविवार की शाम हुई बैठक में जुलाई 2018 के बाद से मुकदमेबाजी पर खर्च की गई अत्यधिक राशि को जानने के बाद अचंभित रह गए। शीर्ष परिषद के एक सदस्य ने दावा किया, “जुलाई 2018 से डीडीसीए ने मुकदमेबाजी पर लगभग नौ करोड़ रुपये खर्च किए हैं, जिसमें अधिवक्ताओं और पेशेवरों की भर्ती शामिल है।”

हालांकि डीडीसीए के पूर्व महासचिव अनिल खन्ना की पत्नी रेणु खन्ना की अध्यक्षता में हुई रविवार की बैठक में कुछ अजीब कारणों से किसी मूल्य या संख्या का उल्लेख नहीं किया गया है। दिलचस्प बात यह है कि वर्तमान में इसके लोकपाल या अदालतों द्वारा सभी डीडीसीए के पदाधिकारियों को निलंबित कर दिया गया है।

वरिष्ठ वकील मनिंदर सिंह की अध्यक्षता में एक नई कानूनी समिति, जिसे केंद्र सरकार ने इस महीने परिषद में फिर से नामांकित किया था, डीडीसीए के कानूनी मामलों से संबंधित सभी निर्णय लेने के लिए बनाई गई है, जिसमें अधिवक्ताओं की नियुक्ति, अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता, संस्थान की नियुक्ति और मुकदमों आदि को वापस लेना शामिल है। केंद्र सरकार के नए नॉमिनी सुनील यादव और रजनी अब्बी कानूनी समिति के अन्य सदस्य हैं।

परिषद ने सौरभ चड्ढा को स्थायी वकील सह कानूनी रिटेनर के रूप में फिर से नियुक्त किया, जिसे उसने ‘उचित रिटेनर’ कहा है। इसके साथ ही शीर्ष परिषद के सदस्यों ने कहा कि दत्ता की कार्रवाई संदिग्ध है। परिषद ने कहा, “यह देखा गया कि अधिवक्ता गौतम दत्ता की कार्रवाई विवादास्पद है और कंपनी के हित में नहीं है। वह कंपनी की ओर से अधिवक्ताओं को बिना किसी प्राधिकरण और कंपनी से निर्देश के शामिल कर रहे थे।”

परिषद ने यह भी कहा कि कर्मचारियों की कई शिकायतें भी मिली हैं कि जब से उन्होंने रिटेनर के रूप में पदभार संभाला, वह खुद को एक स्वतंत्र पेशेवर होने का दावा करने के बावजूद प्रशासनिक और आधिकारिक मामलों में हस्तक्षेप कर रहे थे। परिषद ने कहा, “जब से उन्होंने रिटेनर के रूप में पदभार संभाला है, डीडीसीए ने 3.5 करोड़ से अधिक कानूनी खर्च किए। उनका आचरण डीडीसीए के हित में नहीं है।”

वकील गौतम दत्ता से जब संपर्क किया गया तो उन्होंने उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों का खंडन किया। दत्ता ने कहा, “एक तरह से यह अच्छा है कि उन्होंने घोर अवैधता का सहारा लेकर मुझे हटाने का प्रयास किया है और इस प्रक्रिया में खुद को उजागर किया है। डीडीसीए में वर्तमान में चल रहे फॉरेंसिक ऑडिट से पहले मेरा ‘एक्सपोज’ जिसके लिए मुझे माननीय लोकपाल (सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश दीपक वर्मा) द्वारा समन्वयक के रूप में नियुक्त किया गया था, डीडीसीए को ऐसे हिला देता, जैसा पहले कभी नहीं हुआ होगा और इससे कई चेहरों से नकाब उतर जाते।

गौतम दत्ता ने आगे कहा कि “बेचारे साथियों के पास मुझे हटाने के अलावा बहुत कम विकल्प बचे थे। हालांकि वे भूल जाते हैं कि भ्रष्ट और भ्रष्टाचार हमेशा अमिट निशान छोड़ते हैं। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता और मैं निश्चित रूप से क्रिकेट के दोषियों को उजागर करूंगा।”

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