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दुनिया से अलग है इस गाँव के रिवाज, यहां दुल्हन की नहीं बल्कि दुल्हे की होती है विदाई

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भारत में एक जगह ऐसी भी हैं, जहां दूल्हा नहीं बल्कि दुल्हन बारात लेकर आती है और दूल्हे को अपने साथ ले जाती है। अगर आपने जौनसार बावर का नाम नहीं सुना है, तो आज इस बारे में जान भी लीजिए। यहां सदियों से एक परंपरा चली आ रही है। इस जगह के लोग खुद को पांडवों के वंशज मानते हैं। इस बारे में कुछ और भी बातें जान लीजिए।

यहां वधू बारात लेकर दूल्हे के घर जाती है। खास बात ये है कि इन शादियों में दहेज का बिल्कुल भी प्रावधान नहीं है। कहा जाता है कि यहां अगर कोई शादी के दौरान ज्यादा शानो-शौकत या रुतबा दिखाता है, तो समाज द्वारा उसका विरोध भी किया जाता है। सदियों से यहां जो परंपरा चली आ रही है, उसका निर्वहन भी यहां के लोग बेहद सादगी से करते हैं।

यहां के रीति-रिवाज और परंपराएं देश के बाकी इलाकों से काफी अलग है। यहां जब भी बारात निकलती है तो वधू खुद दूल्हे के घर पहुंचती है। पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन एक बार में ही सम्मोहित कर लेती है। नाचते और गाते हुए बाराती दूल्हे के घर पहुंचते हैं। पारंपरिक रीति रिवाजों के साथ, यहां शादी की हर एक रस्म को निभाया जाता है।

इसके बाद अगले दिन बारात वापस लौट आती है। हालांकि वधू अपने पति के घर में चार से पांच दिन तक रुकती है। कुछ उसी तरह की परंपरा हिमाचल प्रदेश के कुछ इलाकों में भी है। हिमाचल में इसे गाडर विवाह के नाम से जाना जाता है। अनूठी लोक संस्कृति के लिए जौनसार बावर देश और दुनिया में विख्यात है। इसके अलावा भी कुछ खास बातें हैं।

जौनसार का पहनावा, लोक गीत, नृत्य जब वातावरण में गूजते हैं तो हर कोई इस अनूठी परंपरा का कायल हो जाता है। यहां शादी के दौरान परंपराओं का पूरा ख्याल रखा जाता है। सांस्कृतिक आयोजन को स्थानीय लोग घर के बजाय गांव के पंचायती आंगन में करना पसंद करते हैं। जब वधू वर पक्ष के घर पहुंचती है और हंसी ठिठोली के बीच सभी रस्मो रिवाज निभा लिए जाते हैं।

वधू पक्ष के लोग शगुन के नाम पर मात्र पांच बर्तन बेटी के पास छोड़ कर भरे मन से विदाई लेते हैं। दहेज मांगने की बात तो दूर, यदि कोई पिता अपनी बेटी के विवाह में अतिरिक्त दिखावा करने की भी कोशिश करता है तो बड़े बुजुर्ग उसके विरोध में खड़े हो जाते हैं। देहरादून से तकरीबन नब्बे किलोमीटर दूर जनजातीय क्षेत्र जौनसार बावर में विवाह की रस्में इसी तरह निभाई जाती हैं।

वधू के साथ आए बाराती वाद्य यंत्रों के साथ नाचते गाते हुए वर के गांव से कुछ दूर ठहर जाते हैं। वहां सत्कार के बाद शाम को दावत होती है। इसके बाद रात भर नाच गाना चलता है, जिसे स्थानीय बोली में गायण कहते हैं। दूसरे दिन वर पक्ष के आंगन में हारुल, झेंता, रासो व जगाबाजी जैसे लोकगीत और नृत्यों का आयोजन होता है। बारात की विदायी के बाद दुल्हन तीन या पांच दिन ससुराल में रह कर वापस मायके आती है।

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