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कोरोना वायरस

भारत कोरोना संक्रमण में कैसे हुआ सबसे बदतर, क्या एयरबॉर्न हो चुका वायरस?

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भारत कोरोना संक्रमण में कैसे हुआ सबसे बदतर, क्या एयरबॉर्न हो चुका वायरस?

कोरोना वायरस के रोजाना बढ़ते औसतन साढ़े तीन लाख से ज्यादा मामलों ने दहशत का माहौल खड़ा कर दिया है. अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी से लगातार लोगों की मौत हो रही हैं. लोग बेबसी के साथ इस भयानक तमाशे को देखने पर मजबूर हैं. इस बीच हेल्थ एक्सपर्ट्स भी लोगों से सुरक्षित रहने और संयम बरतने की अपील कर रहे हैं. आज तक के माध्यम से कई विशेषज्ञों ने लोगों को सावधानी बरतने की सलाह दी है.

 

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एम्स में कोविड विभाग के चीफ डॉ. राजेश मल्होत्रा ने ऑक्सीजन की कमी से परेशान हो रहे लोगों को एक बेहद खास जानकारी दी. उन्होंने कहा, ‘ऑक्सीजन लेवल 90 के नीचे जाते ही लोग एकदम से घबरा रहे हैं. अक्सर तेज खांसी आने, जी मिचलाने, हिलने-डुलने या चलने से भी ऑक्सीजन लेवल नीचे चला जाता है. दूसरा, पल्स ऑक्सीमीटर को ढंग से न लगाने पर भी ऑक्सीजन लेवल कम दिखाई देता है. इसलिए ऑक्सीजन लेवल को जांचते वक्त इन सभी बातों का बारीकी से ध्यान रखें.’

 

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डॉ. मल्होत्रा ने कहा कि शरीर में ऑक्सीजन की कमी होने पर उल्टा लेटने से भी राहत मिलती है. अगर आपकी बॉडी को ऑक्सीजन की कमी महसूस नहीं हो रही है और फिर भी ऑक्सीमीटर पर ऑक्सीजन लेवल 90 के नीचे दिख रहा है तो हो सकता है आपने वो ठीक से न लगाया हो. अगर वाकई सांस लेने में तकलीफ हो रही है तो डॉक्टर से तुरंत संपर्क करें.

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इंटरनेशनल मेडिसिन स्पेशलिस्ट डॉ. सम्राट डी. शाह ने कहा कि इस वक्त RT-PCR की रिपोर्ट को टेस्ट करने से बेहतर होगा कि हम मरीज और उसके लक्षणों का इलाज करें. यदि किसी मरीज में लक्षण नजर आ रहे हैं तो उसे आइसोलेट करें. घर में किसी सदस्य के कोरोना पॉजिटिव होते ही घबराएं नहीं. अपने लक्षणों को मॉनिटर करते रहें और डॉक्टर को बॉडी के उतरते-चढ़ते टेंपरेचर व ऑक्सीजन लेवल के बारे में बताएं. इसके बाद डॉक्टर्स ये तय करेंगे कि आपको स्टेरॉयड की आवश्यक्ता है या हॉस्पिटलाइजेशन की.

Photo: Getty Images

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फॉर्टिस अस्पताल के चेयरमैन डॉ. अशोक सेठ ने हवा में कोरोना के संक्रमण पर विशेष जानकारी दी. डॉ. सेठ ने कहा, ‘हवा में संक्रमण पहले भी हमारे लिए चिंता का विषय बन चुका है. ये इंफेक्शन एक ड्रॉपलेट के फॉर्म में ट्रैवल करता है. ये ड्रॉपलेट, खांसते, छींकते या बोलते वक्त बाहर आते हैं. लेकिन ड्रॉपलेट बड़े होने की वजह से ये ज्यादा दूर नहीं जा पाते हैं और कुछ दूरी के बाद जमीन पर गिर जाती हैं. इसलिए लोगों को कम से कम छह फीट की दूरी बनाने की सलाह दी जाती है.’

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डॉ. सेठ ने कहा, ‘पिछले दो-तीन हफ्तों में इसे लेकर काफी रिसर्च हुआ है. होटेल के एक कमरे से दूसरे कमरे में लोगों के संक्रमित होने से ये बात साबित हो चुकी है कि एक एयरबॉर्न डिसीज है. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि ये बाहर हवा में भी मौजूद है. इसका मतलब है कि ये वायरस ड्रॉपलेट की मदद से हवा में कुछ देर के लिए ठहर सकता है. ये कुछ घंटों तक हवा में ट्रैवल कर सकता है. इसलिए बंद जगहों या भीड़ वाली जगहों पर मास्क पहनकर रखें और लोगों से निश्चित दूरी बनाकर रखें.’

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डॉ. सेठ ने कहा कि मास्क की डबल लेयर्स ही किसी इंसान को इस वायरस से पूरी तरह बचा सकती है. इसके अलावा, कपड़े का मास्क भी 50-60 प्रतिशत ही हमारा बचाव कर सकता है. मास्क ऐसा होना चाहिए जो हमारे मुंह और नाक को चारों तरफ से सील कर दे. ताकि ड्रॉपलेट को अंदर जाने की जगह ही न मिल पाए. मौजूदा वेरिएंट बेहद संक्रामक है, इसलिए इसलिए बेवजह घर से बाहर न निकलें. ध्यान रखें कि आपके कार्यस्थल और घर में भी वेंटिलेशन की पर्याप्त सुविधा होनी चाहिए.

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मेदांता के डॉक्टर अरविंद कुमार कहते हैं, ‘पिछले साल की तुलना में इस बार का वेरिएंट ज्यादा खतरनाक है. पहले लोगों को करीब 5 दिन तक बुखार हो रहा था और डायरिया की समस्या भी इतनी नहीं थी. बच्चों पर उसका असर भी ज्यादा नहीं था. पिछली बार मरीज को आइसोलेट करने से घर के बाकी सदस्यों का बचाव हो रहा था. लेकिन इस बार स्थिति अलग है. इस बार घर के बाकी सदस्य भी बड़ी तेजी से संक्रमित हो रहे हैं. इसका मतलब यही है कि ये पहले से कहीं गुना ज्यादा संक्रामक है.’

Photo: Getty Images

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डॉ. अरविंद के मुताबिक, ‘इंग्लैंड से ब्रिटिश वेरिएंट का जो डेटा आया था उसमें यही बताया गया कि ये न सिर्फ ज्यादा संक्रामक है, बल्कि इसका मॉर्टालिटी रेट भी पिछले वाले से बहुत ज्यादा है. हालांकि अचानक से ज्यादा केस बढ़ने की वजह से भी लोगों की मौत हो रही है. 18 से 49 साल की उम्र के लोग बड़ी संख्या में वायरस का शिकार हुए हैं. पिछली बार जिनको कोरोना हुआ था, उनकी बॉडी में एंटीबॉडीज बन जाने चाहिए थे, लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसे लोग दोबारा वायरस की चपेट में आ रहे हैं. वैक्सीन के दोनों डोज़ लेने के बाद भी लोग संक्रमित हुए हैं.’

Photo: Reuters

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डॉ. अरविं ने एक और खास बात बताई कि पिछले एक साल में सबसे ज्यादा ट्रांसमिशन उन जगहों पर हुआ है जहां कम स्पेस में ज्यादा लोगों दिखाई दिए. जैसे बर्थडे पार्टी, शादी, समारोह आदि. खासतौर से जिन जगहों पर वेंटिलेशन की कमी थी और वहां एयरकंडीशनर हॉल थे वहां ऐसी दिक्कतें ज्यादा देखी गईं.

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उन्होंने कहा, अगर कोरोना मरीजों की ये संख्या चार लाख पहुंची तो स्थिति कल्पना से भी ज्यादा भयावह होगी. अस्पतालों में पहले ही मरीजों की भीड़ है. मरीजों के लिए अभी भी आईसीयू बेड और ऑक्सीजन का इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है. ऐसे में और ज्यादा मामले बढ़ने निश्चित ही संकट पैदा होगा.

Source : Aaj Tak

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