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शहीदों के परिवार के लिए हर महीने 4 हजार जमा कराएंगे बुजुर्ग पति-पत्नी, सलाम है इन दोनों को

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पुलवामा में आ’तंकी हमले में 40 जवानों की शहादत, बदले में देश की वायुसेना द्वारा पीओके में घुसकर की गई एयर स्ट्राइक और विंग कमांडर अभिनंदन के साहस ने देश के लोगों को सेना के प्रति जज्बे से भर दिया। इसी का एक उदाहरण है चित्तौड़गढ़ के एक पेंशनर दंपती।

जिन्होंने आजीवन हर महीने 4 हजार रुपए सैनिक कल्याण के लिए देश के रक्षा कोष में जमा कराने का निर्णय ले लिया। दोनों के संयुक्त बचत खाते से स्वतः राशि कटकर रक्षा कोष में चली जाए, इसके लिए उन्होंने कलेक्टर के माध्यम से बैंक को भी पत्र भेज दिया।

कबीर कॉलोनी निवासी दंपती ओमप्रकाश शर्मा एवं सरोज दाधीच ने बताया कि तीन-चार महीने से लगातार मन में ख्याल आ रहा था कि देश के लिए कुछ किया जाना चाहिए। इसी बीच पुलवामा में आ’तंकी हमले ने झकझोर दिया। इसके कुछ दिन बाद ही 20 फरवरी को शादी की 42वीं सालगिरह थी। दंपती कलेक्ट्री में पहुंचे। कलेक्टर शिवांगी स्वर्णकार को शहीदों को श्रद्धांजलि स्वरूप सैनिक कल्याण के लिए रक्षा कोष में आजीवन प्रति महीने चार हजार रुपए जमा कराने का प्रार्थना पत्र पेश कर दिया।

इनके निर्णय से प्रभावित कलेक्टर ने भी हाथों हाथ सैनिक कल्याण बोर्ड भीलवाड़ा के अधिकारियों को इसकी आवश्यक कार्रवाई करने को कह दिया। दो दिन पहले सैनिक कल्याण बोर्ड के अधिकारी भी दंपती से आकर मिल लिए। दंपती ने हर महीने यह राशि काटने के लिए एसबीआई ब्रांच में अपने संयुक्त बचत खाते के नंबर भी कलेक्टर कार्यालय एवं सैनिक कल्याण बोर्ड को दिए। संयुक्त खाता भी इसलिए कि यदि दोनों में किसी का भी निधन हो जाए तब भी खाता चालू रहे और रक्षा कोष में रुपए जाते रहे।

पेंशन का 5% रक्षा कोष में : हर महीने ओमप्रकाश को करीब 32 हजार एवं पत्नी सरोज को करीब 27 हजार रुपए पेंशन आती है। इस तरह इन्होंने अपनी कुल पेंशन का करीब पांच प्रतिशत से अधिक हिस्सा रक्षा कोष के नाम कर दिया।

रक्षा कोष के लिए कलेक्टर के मार्फत बैंक को लिखा पत्र : पिता से मिली प्रेरणा : मूलतया भीलवाड़ा जिले के शाहपुरा निवासी ओमप्रकाश शर्मा के पिता स्व. यशपाल शर्मा बरसों तक चित्तौड़ हायर सैकंडरी स्कूल में प्रिंसिपल और फिर डीईओ भी रहे। सख्त अनुशासन व कुशल प्रशासक डीईओ के रूप में लोग आज भी याद करते हैं। यशपालजी अपने सेवाकाल के दौरान गरीब बच्चों को ड्रेस एवं स्कूल फीस तक जमा कराते थे। वे कहते थे कि यदि घर में जरूरत के सभी काम हो जाए तो मददगारों की मदद में आगे रहना चाहिए। इसी प्रेरणा ने पुत्र एवं पुत्र वधु को यह निर्णय लेने का विचार दिया

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