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सरदार पटेल ने RSS पर बैन क्यों लगाया था?

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सरदार वल्लभभाई पटेल आज जिंदा होते, तो अपना 143वां जन्मदिन मनाते. वो नहीं हैं. मगर उनके बर्थडे के दिन, यानी 31 अक्टूबर को सरदार वल्लभभाई पटेल जयंती बहुत धूम से मनाई जा रही है. 182 मीटर ऊंची उनकी मूर्ति का उद्घाटन हुआ. ये काम हुआ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों. मोदी बीजेपी के नेता हैं. नेता बनने से पहले वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के कार्यकर्ता थे. पिछले कुछ समय से पटेल का काफी जिक्र बढ़ गया है. इसका श्रेय हमें संघ, बीजेपी और मोदी को भी देना होगा. ये लोग पटेल की बहुत बातें करते हैं. ये कहते हैं, पटेल के साथ अन्याय हुआ. कि अगर नेहरू की जगह वो देश के प्रधानमंत्री होते, तो भारत आज कहीं ज्यादा मजबूत होता. गोलवलकर ने भी पटेल के लोहे जैसे मजबूत इरादों की तारीफ की थी. जब पटेल थे, तब न मोदी थे, न बीजेपी. मगर संघ था. संघ पटेल के लिए जो कहता है, वो तो हम जानते हैं. अब ये भी जान लीजिए कि पटेल ने संघ के बारे में क्या कहा था? (Patel and RSS)

Patel and RSS

गांधी की हत्या से पहले RSS पर पटेल क्या सोचते थे?

सरदार पटेल हिंदूवादी थे. पारंपरिक थे. राष्ट्रवादी थे. संघ भी हिंदुत्व की बातें करता है. पटेल भले खुद कांग्रेसी रहे हों, मगर उन्हें RSS से परेशानी नहीं थी. उनकी नजर में संघ देशभक्त था. जनवरी 1948 में उन्होंने गांधी की हत्या से पहले कहा था-

आप डंडे के जोर पर किसी संगठन को नहीं कुचल सकते. डंडा तो चोरों और डकैतों के लिए होता है. संघ तो देशभक्त है. उसे अपने देश से प्यार है. बस उनके सोच की दिशा थोड़ी भटक गई है. कांग्रेस के लोगों को उन्हें प्यार से जीतना होगा.

मगर ये गांधी के हत्या से पहले की बात है. 30 जनवरी, 1948 को नाथूराम गोडसे ने गांधी को गोली मार दी. इसके बाद काफी चीजें बदल गईं.

Patel and RSS

गांधी की हत्या ने क्या असर डाला पटेल पर?

पटेल खुद को गांधी का सिपाही कहते थे. दोनों ही गुजराती थे. खान-पान की आदतें भी बहुत हद तक एक जैसी थीं. कहते हैं कि गांधी जिस तरह पटेल के साथ बातें करते हुए हंसते थे, वैसा औरों के साथ नहीं होते थे. गुरु-शिष्य के अलावा उनके बीच बेहद भावुक सा एक रिश्ता भी था. बहुत प्यार था. इसी प्यार और सम्मान के नाते गांधी जब भी पटेल से कुछ कहते, वो ना नहीं कह पाते थे. गांधी की हत्या नेहरू और पटेल, दोनों के लिए असहनीय थी. पटेल चूंकि गृह मंत्री थे, तो गांधी की हत्या के बाद चली जांच में पटेल का डायरेक्ट एन्वॉल्वमेंट था. गांधी की हत्या के एक महीने बाद 27 फरवरी, 1948 को नेहरू को भेजी गई अपनी चिट्ठी में पटेल ने लिखा था-

गांधी की हत्या में RSS शामिल नहीं थी. ये काम हिंदू महासभा के एक कट्टर धड़े का था, जो सीधे सावरकर के नेतृत्व में काम कर रहा था. उसी ने ये साजिश बनाई. मगर गांधी की हत्या का स्वागत किया संघ और महासभा ने. ये लोग गांधी की विचारधारा, उनकी सोच के सख्त खिलाफ थे. मगर इसके अलावा मुझे नहीं लगता कि संघ या हिंदू महासभा के किसी और सदस्य पर इस अपराध का इल्जाम लगाना मुमकिन है. RSS के अपने पाप और अपराध हैं, जिनका उसे जवाब देना है. मगर ये काम उन्होंने नहीं किया.

बाद के दिनों में जैसे-जैसे जांच बढ़ी, पटेल को महसूस होता गया कि संघ का सीधे-सीधे हत्या में हाथ न सही, लेकिन उसकी फैलाई सांप्रदायिक नफरत ने स्थितियां जरूर खराब कीं. गांधी की हत्या के बाद उन्होंने RSS पर प्रतिबंध लगा दिया. हालांकि तकरीबन डेढ़ साल बाद ये बैन हटा भी दिया उन्होंने. मगर RSS की विचारधारा और गतिविधियों को ध्यान में रखते हुए पटेल ने ये भी साफ कर दिया कि संघ राजनीति में हिस्सा नहीं ले पाएगा.

‘संघ की गतिविधियों से भारत सरकार के लिए खतरा पैदा हुआ’

18 जुलाई, 1948 को श्यामा प्रसाद मुखर्जी को एक चिट्ठी भेजी थी. ये चिट्ठी काफी मशहूर है-

गांधी जी की हत्या का केस अभी कोर्ट में है. इसीलिए RSS और हिंदू महासभा, इन दोनों संगठनों के शामिल होने पर मैं कुछ नहीं कहूंगा. लेकिन हमारी रिपोर्ट्स में इस बात की पुष्टि होती है कि जो हुआ, वो इन दोनों संगठनों की गतिविधियों का नतीजा है. खासतौर पर RSS के किये का. देश में इस तरह का माहौल बनाया गया कि इस तरह की (गांधी की हत्या) भयानक घटना मुमकिन हो पाई. मेरे दिमाग में इस बात को लेकर कोई शक नहीं कि हिंदू महासभा का कट्टर धड़ा गांधी की हत्या की साजिश में शामिल था. RSS की गतिविधियों के कारण भारत सरकार और इस देश के अस्तित्व पर सीधा-सीधा खतरा पैदा हुआ.

इन्हीं श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अक्टूबर 1951 में जनसंघ की नींव रखी. यही जनसंघ आगे चलकर बीजेपी बना.

Patel and RSS
के बी हेडगेवार के बाद गोलवलकर बने RSS के सरसंघचालक. 1940 से लेकर 1973 तक, वो जब तक जिंदा रहे तब तक उन्होंने संघ का नेतृत्व किया.
‘गांधी की हत्या के बाद संघ के लोगों ने मिठाइयां बांटी’

पटेल ने 11 सितंबर, 1948 को गोलवलकर के नाम एक चिट्ठी भेजी. गोलवलकर उस समय RSS के सरसंघचालक, उसके मुखिया थे. पटेल ने उन्हें लिखा था-

भाई श्री गोलवलकर,

11 अगस्त को भेजा आपका पत्र मिला. जवाहरलाल ने भी मुझे उसी दिन आपका पत्र भेजा. आप RSS को लेकर मेरे विचार अच्छी तरह जानते हैं. लोगों ने उस विचार का स्वागत किया था. मुझे उम्मीद थी कि आपके लोग भी उसे स्वीकार करेंगे. मगर लगता है कि मेरी बातों का RSS के लोगों पर कोई असर नहीं हुआ. उनके कार्यक्रमों (गतिविधियों) में भी किसी तरह का बदलाव नहीं आया. इस बात में कोई शक नहीं कि संघ ने हिंदु समाज की सेवा की है. ऐसे इलाकों में जहां लोगों को मदद की जरूरत थी, किसी संगठन की जरूरत थी, वहां संघ के युवाओं ने महिलाओं और बच्चों की रक्षा की. कोई भी समझदार इंसान इसे लेकर आपत्ति नहीं जताएगा. मगर आपत्तिजनक बात तब उठी जब वो बदले की भावना से भरकर मुसलमानों पर हमले करने लगे. हिंदुओं को संगठित करना और उनकी मदद करना एक बात है. मगर हिंदुओं के साथ जो गलत हुआ, उन्हें जो तकलीफें झेलनी पड़ी, उसका बदला निर्दोषों-लाचारों और महिलाओं-बच्चों से लेना बिल्कुल अलग बात है.

इसके अलावा सभ्यता और शिष्टाचार के सारे तकाजे भुलाकर कांग्रेस के प्रति उनका विरोध, वो भी ऐसी डाह की भावना के साथ, इसने लोगों के बीच एक किस्म की अव्यवस्था पैदा की है. उनके सारे भाषण सांप्रदायिक जहर से भरे थे. जहर फैलाना और हिंदुओं को अपनी रक्षा के लिए अति उत्साहित करना जरूरी नहीं था. इसी जहर का नतीजा था कि देश को गांधी जी के अनमोल जीवन के बलिदान का दर्द झेलना पड़ा. अब न ही भारत सरकार और न ही देश के लोगों की एक इंच सहानुभूति भी संघ के साथ है. बल्कि संघ के प्रति विरोध बढ़ गया है. विरोध तब और बढ़ गया, जब गांधीजी की हत्या के बाद संघ के लोगों ने खुशी जताई. मिठाइयां बांटी. ऐसी स्थितियों में संघ पर कार्रवाई करना भारत सरकार के लिए अनिवार्य हो गया.

इस बात को अब छह महीने बीत चुके हैं. हमें लगा था कि समय के साथ संघ के लोग सही रास्ते पर आ जाएंगे. लेकिन मेरे पास जैसी रिपोर्ट्स आई हैं, उनसे साफ पता लगता है कि संघ के लोग अपनी उन्हीं पुरानी गतिविधियों के अंदर नई जान फूंकने की कोशिशों में लगे हुए हैं. मैं आपसे फिर कहता हूं. जयपुर और लखनऊ में दिए गए मेरे भाषणों पर विचार कीजिए. मैंने RSS के लिए जो राह बताई थी, उसे स्वीकार कीजिए. मुझे यकीन है कि इसी में संघ और इस देश का भला है. इस राह में चलकर हम देश की बेहतरी के लिए हाथ मिला सकते हैं. आपको पता होगा कि हम नाजुक दौर से गुजर रहे हैं. देश में ऊपर से लेकर नीचे तक, हर किसी की जिम्मेदारी है कि वो जैसे हो सके, वैसे इस देश की तरक्की में योगदान दे. देश की सेवा करे. ऐसे नाजुक वक्त में राजनैतिक विचारधारा या पार्टी संघर्ष और पुराने झगड़ों की कोई जगह नहीं है. मैं साफ कह चुका हूं कि संघ के लोग अगर कांग्रेस में शामिल हो जाते हैं, तो वो अपनी देशसेवा जारी रख सकते हैं. अलग रहकर या कांग्रेस का विरोध करके ये नहीं हो सकेगा. मुझे खुशी है कि आपको रिहा कर दिया गया है. मुझे उम्मीद है कि मैंने ऊपर जो भी लिखा है, उसे पढ़कर आप मेरे कहे पर विचार करेंगे. और फिर सही फैसला लेंगे. आपके ऊपर जो प्रतिबंध लगाए गए हैं, उसे लेकर सेंट्रल प्रॉविंस की सरकार के साथ मेरी बातचीत हो रही है. उनका जवाब मिलते ही मैं आपको सूचित करूंगा.

संघ और बीजेपी नेहरू-पटेल जैसे देश के साझा नायकों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करके पॉलिटिक्स कर रहे हैं. इसीलिए इस इतिहास में इनके हिस्से का जो है, वो बताना जरूरी है. उम्मीद है इतिहास से खिलवाड़ करके सेंसेशन बनाने वाले अपनी हिस्ट्री भूले नहीं होंगे. हिस्ट्री का तो स्वाद ही यही है. आप चाहें भी तो पीछे जाकर उसे बदल नहीं सकते.

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