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IAS अविनाश और IAS नीथरा की प्रेम कहानी…जिसमें प्यार है तकरार है और दर्द भी है

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बेशक समुद्र की गहराई कोई नाप नहीं सकता, उसकी गंभीरता ही उसकी निशानी होती है, व्यक्ति का मन भी हर रोज ऐसे गहरेपन में गोते लगाता है, विचार कभी ज्वार-भाटा का रूप ले लेते हैं। इसी उथल-पुथल के बीच से जो शब्द बाहर निकलते हैं, वही कहानी का रूप ले लेते हैं। कुछ ऐसी ही कहानी लिखी है कलेक्टर छवी भारद्वाज ने।

अकेली, कुशल और तेज तरार आईएएस। जो सिर्फ सही काम करने में विश्वास रखती है। लेकिन, उसके जीवन में सब कुछ सही नहीं है। उसका दिल टूटा है, काम में कुछ मिसफिट है और निराश है, इसकी वजह है ‘उनकी अधूरी प्रेम कहानी’। ये कहानी है अविनाश राठौड़ और नीथरा की। अविनाश राठौड़ भारतीय प्रशासनिक सेवा में नीथरा के बैचमेट रहे हैं । नीथरा उसे बहुत प्यार करती थी। महत्वाकांक्षी अविनाश की जिंदगी नीथरा से उलट है। मसूरी में करियर की शुरूआती ट्रेनिंग के दौरान दोनों नजदीक आते हैं और प्रेम पनपता है। लेकिन यह कहानी शादी में तब्दील नहीं हो सकी और दोनों अपने-अपने फर्ज निभाने यानी नौकरी में व्यस्त हो जाते हैं। वो दोनों अलग हो गए।

लेकिन कहते हैं न कि होता वहीं है जो मंदूर-ए-खुदा होता है। किस्मत ने एक बार फिर दोनों को साथ ला खड़ा कर दिया। लेकिन तब तक हालात बिल्कुल बदल चुके थे। नीथरा तो अब भी अकेली है लेकिन अविनाश की जिंदगी में अब उसकी पत्नी और एक बच्चा भी है। दोनों फिर अपने आप को संबंधों के भंवर में फंसा पाते हैं। क्या नीथरा को उसका प्यार मिलेगा? इसे एक किताब के रूप में लिखा है, 2008 बैच की आईएएस और जबलपुर कलेक्टर छवि भारद्वाज ने।

‘लाइक अ बर्ड ऑन द वायर’ : ‘लाइक अ बर्ड ऑन द वायर’ नाम से यह उपन्यास हाल ही में प्रकाशित हुआ है। जानकारी के अनुसार मध्यप्रदेश में पहली बार किसी आईएएस अफसर ने आईएएस अफसर की ही प्रेम कहानी पर कोई किताब लिखी है। इस किताब में नीथरा और अविनाश के अलावा कुछ अन्य आईएएस अफसर और उनकी पत्नी के भी पात्र हैं।

किताब में वर्णित है कुछ ऐसा : भले ही यह उपन्यास हो, लेकिन इस बहाने किताब में आईएएस अफसरों का जीवन, उसमें आने वाली कठिनाईयों और काम के दौरान उन पर आने वाले राजनीतिक दबाव की झलक भी इस किताब में मिलती है। इसके अलावा आईएएस के अधीनस्थ उनके बारे में किस तरह से बातें करते हैं, इसका उल्लेख भी किताब में है।

क्या कहना है छवि भारद्वाज का : जबलपुर कलेक्टर छवि भारद्वाज ने बताया कि कुछ साल पहले छुट्टियों के दौरान मेरे मन में कुछ घटनाएं आई थीं तो मैंने उसे लिख लिया था। कोई कहानी मेरे दिमाग में नहीं थी या योजना बनाकर इस किताब का नहीं लिखा। कहानी पूरी करते-करते यह उपन्यास बन गई। मैंने यह कहानी 2013 में डिंडोरी में कलेक्टर रहते हुए पूरी कर ली थी, लेकिन अब जाकर इसे किताब की शक्ल मिली।

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