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कभी ट्रक साफ़ किए, चपरासी की नौकरी की, तो कभी साबुन बेचे, ऐसे गुजरी रामानंद सागर की ज़िंदगी

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टीवी की दुनिया में 33 साल पहले एक ऐसा निर्देशक आया जिसने लोगों को अपना मुरीद बना लिया. ‘रामायण’ जैसा धारावाहिक आज तक भारतीय सिनेमा के इतिहास में नहीं देखा गया है. यह एक ऐतिहासिक और विश्व प्रसिद्द धारावाहिक है और इसका निर्देशन किया थामशहूर रामानंद सागर ने.

आज रामानंद सागर हमारे बीच नहीं है, लेकिन वे इस धारावाहिक के चलते याद किए जाते हैं. आज हम आपको रामानंद सागर की कुछ ख़ास बातें बताने जा रहे हैं. तो चलिए शुरू करते हैं रामानंद सागर को नजदीक से जानने का सफ़र…

रामानंद सागर का जन्म पाकिस्तान के लाहौर के पास असल गुरूके में 29 दिसंबर 1917 को हुआ था. उनका असली नाम चंद्रमौली चोपड़ा था. दशकों पहले रामानंद सागर के परदादा लाहौर से कश्मीर आ गए थे. बताया जाता है कि, रामानंद सागर को उनकी नानी ने गोद लिया था और उन्होंने ही चंद्रमौली चोपड़ा का नाम बदलकर रामानंद सागर रख दिया. एक समय था जब रामानंद सागर का परिवार बहुत संपन्न था, हालांकि भारत विभाजन के बाद जब उनके परिवार ने भारत आने का फैसला किया तो इसके साथ ही उनका जमा-जमाया व्यापार और सारी प्रॉपर्टी भी उनसे दूर हो गई. इसके चलते उनके परिवार में परेशानी भरे दिन शुरू हो गए.

विभाजन के बाद भारत में आने के बाद रामानंद सागर को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा. ऐसे में रामानंद सागर की पढ़ाई भी मुश्किल हो गई. ऐसे में उन्होंने चपरासी की नौकरी जॉइन कर ली. यहां से वे अपना खर्च चला लेते थे. इसके बाद रामानंद सागर ने ट्रक क्लीनर से लेकर साबुन बेचने और सुनार का भी काम किया. हालांकि उन्होंने पढ़ाई भी जारी रखी. दिन में वे काम और रात में रामानंद सागर पढ़ाई किया करते थे.

रामानंद सागर के मन में कुछ करने की ललक थी. जब उन्होंने ‘मायानगरी’ मुंबई का रुख किया तो फिर उनकी किस्मत ने करवट लेना शुरू कर दिया था. यहां आकर रामानंद सागर द्वारा ‘रेडर्स ऑफ द रेल रोड’ नाम की मूक फिल्म में एक क्लैपर बॉय के तौर पर काम किया गया. इस दौरान उन्होंने असिस्टेंट मैनेजर के रूप में पृथ्वीराज कपूर के पृथ्वी थिएटर में काम किया. रामानंद सागर ने दिग्गज़ अभिनेता रहे ‘शो मैन’ यानी कि राज कपूर की फिल्म बरसात की कहानी और स्क्रीनप्ले लिखा. आगे जाकर वे एक निर्देशक बन गए और हिंदी सिनेमा के साथ ही टीवी इंडस्ट्री को भी उन्होंने अपना बहुत बड़ा योगदान दिया.

ऐसे आया रामायण बनाने का ख़याल…

रामानंद सागर एक बार साल 1976 में अपने चारों बेटों के साथ स्विट्जरलैंड में थे. इस दौरान उन्होंने पहली बार यहां के एक रेस्तरां में रंगीन टीवी देखी थी. वे अपनी फिल्म चरस की शूटिंग के लिए आए थे और यहां वे एक कैफे में गए. कैफे में रंगीन टीवी पर एक फिल्म चल रही थी और काफी देर तक उन्होंने टीवी पर अपनी निगाहें जमाकर रखी. जब उन्होंने टीवी के सामने से निगाहें हटा ली तो उन्होंने अपने बेटों को एक हैरानीभरा फ़ैसला सुनाया. उन्होंने अपने चारों बेटों से कहा कि, वे रामायण बनाएंगे.

1987 में आया रामायण धारावाहिक…

रामायण टीवी धारावाहिक साल 1987 में टीवी पर आया. इस धारावाहिक ने हर एक किरदार से दर्शकों के दिलों पर अमिट चाप छोड़ी. भगवान श्री राम का किरदार अरुण गोविल और माता सीता का किरदार दीपिका चिखलिया ने निभाया था. लक्ष्मण का किरदार सुनील लहरी, हनुमान जी का किरदार दारा सिंह और रावण का किरदार अरविन्द त्रिवेदी ने निभाया था. इस धारावाहिक की दीवानगी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि, लॉक डाउन के दौरान भी टीवी पर यह धारावाहिक 33 साल बाद फिर दिखाया गया और एक बार फिर व्यूज के मामले में रामायण ने इतिहास रच दिया. लोग कहते हैं कि आज तक कभी ऐसा धारावाहिक नहीं देखा

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